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संपादकीय : प्रधानमंत्री का संदेश

संपादकीय : प्रधानमंत्री का संदेश

यह समय की मांग थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नागरिकता कानून और साथ ही प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी को लेकर अपनी बात कहने के लिए आगे आते। दिल्ली की एक रैली में उन्होंने यही किया। उन्होंने न केवल नागरिकता कानून को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम का निवारण किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि जिस एनआरसी को लेकर देश भर में अफवाहों का बाजार गर्म कर लोगों को भड़काया जा रहा है, उसकी तो अभी प्रक्रिया ही तय की जानी शेष है। इसमें संदेह है कि जिन लोगों और खासकर विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं का मकसद ही लोगों को बरगलाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना है, उनके रुख-रवैये में कोई परिवर्तन आएगा, लेकिन आम जनता को तो यह समझना ही होगा कि हकीकत क्या है। इस क्रम में उसे यह भी जानना होगा कि आज जो कांग्र्रेस नागरिकता कानून के साथ-साथ प्रस्तावित एनआरसी का मुखर होकर विरोध कर रही है, उसके शासनकाल में ही मतदाता पहचान पत्र, पैन, आधार कार्ड आदि जारी किए गए। एक सच्चाई यह भी है कि दुनिया के हर जिम्मेदार देश ने अपने नागरिकों का रजिस्टर तैयार किया है। इस जिम्मेदारी का निर्वहन हो, इसकी जरूरत नागरिकता कानून में दर्ज है और इसी कारण 1951 में पहली एनआरसी तैयार की गई। क्या अब यह काम महज इसलिए नहीं होना चाहिए कि कुछ लोग अंधविरोध से ग्रस्त होकर या फिर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लालच में अफवाहें फैलाने में जुट गए हैं?

नागरिकता कानून और प्रस्तावित एनआरसी के विरोध में बिना ज्यादा कुछ सोचे-समझे सड़कों पर उतरने वालों को प्रधानमंत्री की इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या उनकी सरकार की रसोई गैस, आवास, बिजली संबंधी किसी योजना में जाति, मजहब के आधार पर भेदभाव किया गया है? यदि अभी तक ऐसा कोई आरोप विरोधी दल भी नहीं लगा सके हैं, तो इसका यही मतलब है कि नागरिकता कानून के बहाने मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने का एक सुनियोजित अभियान छेड़ा गया। क्या यह किसी से छिपा है कि इस अभियान को किस तरह किस्म-किस्म के दुष्प्रचार के जरिए आगे बढ़ाया जा रहा है। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि दुष्प्रचार में लिप्त इन राजनीतिक एवं गैर-राजनीतिक तत्वों को प्रधानमंत्री ने आड़े हाथों लिया। उन्हें इसकी तह में भी जाना होगा कि आखिर ऐसे तत्व किन कारणों से अपने इरादे में एक बड़ी हद तक सफल हो गए। यह अभियान इतना शातिर है कि जहां धरना-प्रदर्शन अराजकता से बच जा रहा है, वहां तो भीड़ को श्रेय दिया जा रहा है, लेकिन जहां आगजनी और तोड़फोड़ हो रही है, वहां सारा दोष पुलिस के सिर पर मढ़ दिया जा रहा है।