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आलेख : दोराहे पर खड़ी कांग्रेस की मुश्किल - रशीद किदवई

आलेख : दोराहे पर खड़ी कांग्रेस की मुश्किल - रशीद किदवई
कांग्रेस अपना 135वां स्थापना दिवस एक ऐसे समय पर मना रही है, जब वह विचारधारा और नेतृत्व, दोनों मामलों में दोराहे पर खड़ी है। विचारधारा का मामला तो महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन कर सरकार बनाने के बाद से थोड़ा नरम पड़ गया है, किंतु नेतृत्व का मामला अभी भी उलझा हुआ दिख रहा है। एक तरफ जहां अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने पुत्र राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए उत्सुक नजर आती हैं, वहीं आम कांग्रेसी नेताओं में एक ऐसी सोच है कि अभी सोनिया गांधी ही कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभाले रहें। कांग्रेसी नेताओं का यह भी मानना है कि दिल्ली में विधानसभा के चुनाव निपट जाने के बाद ही कांग्रेस के नेतृत्व के मुद्दे को देखने और समझने की कोशिश की जानी चाहिए। दिल्ली में अगले महीने ही विधानसभा हो सकते हैं।

आज कांग्रेस के अंदर जो हलचल मची है, उसका एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए कांग्रेसी नेता इस बात के लिए तो बिल्कुल तैयार नजर आ रहे हैं कि वे राहुल गांधी को ही दोबारा अपना अध्यक्ष चुन लें, लेकिन इसके साथ ही वे राहुल गांधी के कामकाज करने के तौर-तरीके में थोड़ा बदलाव भी देखना चाहते हैं। उनकी एक एक उम्मीद यह भी है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी, दोनों जल्द ही कांग्रेस कार्यसमिति का निष्पक्ष चुनाव कराएंगे। देखना है कि ऐसा हो पाता है या नहीं?

दरअसल कांग्रेस में कार्यसमिति के चुनाव हमेशा एक बहुत बड़ी चुनौती रहे हैं। वर्ष 1991 में जब पीवी नरसिंह राव कांग्रेस अध्यक्ष बने थे तो उन्होंने तिरुपति में अप्रैल 1992 में कार्य समिति के चुनाव कराए थे। इसके अलावा दूसरी बार सीताराम केसरी ने कोलकाता में अगस्त 1997 में कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव कराए थे। कांग्रेस जन यह चाहते हैं कि कार्य समिति के चुनाव के जरिये कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तय हो जानी चाहिए। खासतौर से उन नेताओं के लिए जो नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य नहीं हैं।

सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद उनके तकरीबन 20 वर्ष के लंबे अध्यक्षीय कार्यकाल में कांग्रेस में महत्वपूर्ण पद पर ऐसे लोग मौजूद रहे हैं, जो दरअसल उनके ही पसंदीदा थे। हालांकि बाद में राहुल गांधी ने भी अध्यक्ष पद संभालने के बाद उसी विधि को अपनाते हुए महत्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को बिठाने की कोशिश की, लेकिन उसमें वह पूरी तरह से कामयाब नहीं हुए थे।

अब कांग्रेस के जो वरिष्ठ नेता हैं, उन्हें इस बात का डर है कि राहुल गांधी जब कभी पार्टी अध्यक्ष के रूप में वापस आएंगे तो कहीं वह पार्टी में बड़े पदों पर जैसे कार्य समिति के सदस्य, पार्टी के महासचिव या प्रदेश अध्यक्षों को अपनी पसंद से मनोनीत करना न शुरू कर दें। जाहिर है कि यदि कार्य समिति का चुनाव होगा तो उसमें वरिष्ठता का एक तरीके से क्रम तय हो जाएगा।
कांग्रेस कार्य समिति चुनने का अधिकार ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के 1500 सदस्यों को है, जो पूरे देश के विभिन्न् राच्यों से आते हैं। कांग्रेस के संविधान के अनुसार कांग्रेस कार्य समिति 24 सदस्य की होनी चाहिए। जिसमें 12 सदस्यों का चुनाव होना चाहिए और 12 सदस्यों को कांग्रेस अध्यक्ष मनोनीत कर सकता है। इन 12 सदस्यों में अल्पसंख्यक, महिलाएं और कमजोर तबके के लोग होते हैं।

एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव बहुत बार इस बिना पर नहीं किए जाते हैं कि उससे पार्टी में बिखराव हो सकता है और आपसी झगड़े बढ़ सकते हैं। फलस्वरूप कार्य समिति ही कांग्रेस अध्यक्ष को इस बात के लिए अधिकृत कर देती है कि वह समस्त 24 सदस्यों को मनोनीत कर दें। लेकिन आज पार्टी के अंदर से कुछ आवाजें उठ रही हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी को पार्टी के अंदर से उठती इन आवाजों का संज्ञान लेना चाहिए।

झारखंड विधानसभा के चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस में आशा की एक नई किरण जगी है। यहां झारखंड मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ी कांग्रेस को 16 सीटें मिली हैं। झारखंड चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि यदि केंद्रीय नेतृत्व पार्टी में सबको साथ लेकर चले तो राज्यों में नतीजे बेहतर हो सकते हैं।

गौरतलब है कि हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की तरह झारखंड चुनाव में भी गांधी परिवार की बहुत सक्रिय भूमिका नहीं थी। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा, दोनों ने प्रचार में हिस्सा तो लिया था, लेकिन गठबंधन के अधिकतर काम हेमंत सोरेन के जिम्मे ही थे। कांग्रेस पार्टी की जिम्मेदारियों के निर्वाह का जिम्मा वहां मौजूद कांग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह और दूसरे जमीनी नेताओं पर था। कामकाज की इस परिपाटी में कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा कामयाबी मिली है। उम्मीद है कि यह मॉडल आने वाले समय में रहेगा और चलेगा।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का काम यह है कि वह सबको साथ लेकर चले और जो राष्ट्रीय मुद्दे हैं, उनके संदर्भ में एक स्पष्ट नीति तय करे। कार्य समिति के चुनाव होने से उसके जो सदस्य होंगे, उनसे भी ऐसी आशा की जाती है कि वे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी बात रख रखेंगे। कांग्रेस के अंदर फैसला लेने का फिलहाल जो अधिकार है, वह सोनिया गांधी के पास है। उनके सलाहकारों का पार्टी के अंदर या बाहर लोकप्रियता या जनाधार जानने का कोई पैमाना नहीं है।